रायपुर के कोटा स्टेडियम में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 के मंच पर जब झारखंड के बाबूलाल हेम्ब्रम ने 60 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक (Silver Medal) अपने नाम किया, तो यह केवल एक पदक की जीत नहीं थी, बल्कि अभावों के खिलाफ एक आदिवासी युवा के जिजीविषा की जीत थी। बाबूलाल की यह सफलता उन सैकड़ों छत्तीसगढ़ी खिलाड़ियों के लिए भी एक मिसाल है जो बस्तर और सरगुजा के दूरस्थ अंचलों से आकर राजधानी के खेल मैदानों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।
जमीनी हकीकत: संसाधनों का अभाव और ‘देसी’ जुगाड़ से अभ्यास
बाबूलाल का सफर रामगढ़ के केरिबांदा गांव की उन तंग गलियों से शुरू हुआ, जहाँ आज भी बुनियादी खेल सुविधाएं एक सपना हैं। 36khabar की पड़ताल बताती है कि जब कोच गुरविंदर सिंह ने उन्हें वेटलिफ्टिंग की सलाह दी, तब बाबूलाल के पास प्रोफेशनल बारबेल खरीदने के पैसे नहीं थे। उन्होंने निर्माण स्थलों (Construction sites) से फेंकी गई लोहे की रॉड और बांस के टुकड़ों को जोड़कर अपना वजन संतुलित करना सीखा।
स्थानीय कोच और खेल विशेषज्ञ आनंद सिंह कहते हैं: “आदिवासी क्षेत्रों में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन बाबूलाल जैसे खिलाड़ी यह साबित करते हैं कि अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो ‘जुगाड़’ भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण का आधार बन सकता है। छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर के वेटलिफ्टर्स को भी बाबूलाल के इस मॉडल से प्रेरणा लेनी चाहिए।
ऐतिहासिक संदर्भ और पैटर्न: जनजातीय खेलों का बढ़ता कद
रायपुर में आयोजित यह दूसरा बड़ा जनजातीय खेल आयोजन है। इससे पहले 2023-24 के दौरान भी राज्य सरकार ने ‘छतीसगढ़िया ओलंपिक’ के माध्यम से पारंपरिक खेलों को बढ़ावा दिया था। बाबूलाल का 2024 में खेलो इंडिया यूथ गेम्स (49 किग्रा) में गोल्ड जीतना और अब रायपुर की धरती पर 60 किग्रा वर्ग में सिल्वर जीतना यह दर्शाता है कि आदिवासी एथलीट अब केवल पारंपरिक तीरंदाजी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे तकनीकी खेलों जैसे वेटलिफ्टिंग में भी अपना लोहा मनवा रहे हैं।
पिछली बार के आंकड़ों पर गौर करें तो जनजातीय क्षेत्रों से आने वाले 65% खिलाड़ियों को डाइट और आधुनिक किट के अभाव में बीच में ही खेल छोड़ना पड़ता है, लेकिन बाबूलाल ने पटियाला के राष्ट्रीय शिविर तक पहुँच कर इस पैटर्न को तोड़ा है।
जिला-वार प्रभाव और भविष्य की राह
बाबूलाल की सफलता का असर छत्तीसगढ़ के इन जिलों पर सीधा पड़ेगा:
- बस्तर और दंतेवाड़ा: यहाँ के पोटा केबिन में रहने वाले बच्चों के लिए बाबूलाल एक ‘रोल मॉडल’ बन सकते हैं।
- रायपुर और दुर्ग: इन शहरी केंद्रों में प्रशिक्षण ले रहे खिलाड़ियों के लिए यह संदेश है कि सुविधाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘मेहनत का निरंतर होना’ (Consistency) है।
- जशपुर: तीरंदाजी के साथ-साथ यहाँ वेटलिफ्टिंग और एथलेटिक्स की अकादमी खोलने की मांग जोर पकड़ सकती है।
अब आगे क्या? (पाठकों के लिए जानकारी)
यदि आप या आपके गांव का कोई बच्चा खेल में रुचि रखता है और आर्थिक रूप से कमजोर है, तो ये कदम उठाएं:
- रायपुर स्थित राज्य खेल प्रशिक्षण केंद्र (बहतराई/कोटा) में प्रवेश के लिए ट्रायल की जानकारी हेतु जिला खेल अधिकारी से संपर्क करें।
- खेलो इंडिया योजना के तहत मिलने वाली स्कॉलरशिप (6.28 लाख रुपये वार्षिक) के लिए आधिकारिक पोर्टल पर पंजीकरण की प्रक्रिया समझें।
- हेल्पलाइन: छत्तीसगढ़ खेल संचालनालय – 0771-2234500 (कार्यकारी समय में)











