बस्तर पांडुम: सांस्कृतिक वैभव के बीच कलाकारों की अनसुनी पुकार
जगदलपुर/बस्तर: लालबाग मैदान में आयोजित संभागीय स्तरीय ‘बस्तर पांडुम 2026’ के समापन समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर की समृद्ध जनजातीय परंपराओं का अवलोकन किया। ढोकरा शिल्प, टेराकोटा और माड़िया संस्कृति की जीवंत झांकियों ने अतिथियों का मन मोह लिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इसे संस्कृति संरक्षण का बड़ा माध्यम बताया है। लेकिन, चकाचौंध भरे इस मंच के पीछे बस्तर के अंदरूनी इलाकों के कलाकारों और ग्रामीणों की अपनी कुछ अलग चिंताएं हैं।
जमीनी हकीकत: मंच का सम्मान बनाम बाजार का अभाव
अमित शाह ने जिन ‘डोकरा क्राफ्ट’ और ‘सीसल आर्ट’ की सराहना की, उसे बनाने वाले कोंडागांव और बस्तर के कलाकार आज भी बिचौलियों के चंगुल से जूझ रहे हैं।
जमीनी स्तर पर पड़ताल: अबूझमाड़ के ओरछा से आए एक शिल्पकार (नाम न छापने की शर्त पर) ने बताया, “साहब, पांडुम जैसे आयोजनों में हमें वाहवाही तो बहुत मिलती है, लेकिन जब हम अपने गाँव लौटते हैं, तो हमारे पास साल भर सामान बेचने के लिए कोई पक्का बाजार नहीं है। सरकारी हाट-बाजारों में हमें जगह नहीं मिलती और शहर के व्यापारी हमारे 2000 रुपये के शिल्प को 500 रुपये में मांगते हैं।”
दंतेवाड़ा की मांगली और उनकी टीम ने जनजातीय गीत श्रेणी में पुरस्कार तो जीता, लेकिन हकीकत यह है कि इन लोक कलाकारों को साल में केवल 2-3 सरकारी कार्यक्रमों के अलावा अपनी कला प्रदर्शन का कोई और जरिया नहीं मिल पा रहा है।
जिला-वार प्रभाव और सांस्कृतिक विश्लेषण
बस्तर पांडुम का प्रभाव संभाग के अलग-अलग जिलों में भिन्न है:
- दंतेवाड़ा और सुकमा: यहाँ की ‘गौर माड़िया’ नृत्य और पारंपरिक वेशभूषा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। हालांकि, सुकमा के सुदूर क्षेत्रों में जहाँ अभी भी सुरक्षा बलों के कैंप और नक्सल मूवमेंट के बीच जनजीवन है, वहां ‘पांडुम’ जैसे उत्सवों की पहुंच सीमित है।
- नारायणपुर और बीजापुर: ‘वनौषधि’ और ‘जनजातीय पेय’ के मामले में ये जिले अग्रणी रहे हैं। वैदराजों का कहना है कि अगर सरकार इन जड़ी-बूटियों के लिए प्रोसेसिंग यूनिट लगाए, तो कोंडागांव के महुआ की तरह यहाँ के उत्पादों की ब्रांडिंग हो सकती है।
- कांकेर और कोंडागांव: ये जिले औद्योगिक बेल्ट के करीब होने के कारण हस्तशिल्प में ज्यादा व्यावसायिक हो चुके हैं, जिसका असर यहाँ की कला की मौलिकता पर भी पड़ रहा है।
ऐतिहासिक संदर्भ और पैटर्न की पहचान
यह पहली बार नहीं है जब बस्तर की कला को राष्ट्रीय मंच मिला है। 2018 के बाद से ‘बस्तर दशहरा’ और अब ‘बस्तर पांडुम’ के जरिए पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशें तेज हुई हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि 2022 में भी इसी तरह के बड़े वादे किए गए थे, जिसमें बस्तर के शिल्पियों के लिए ‘आर्ट विलेज’ बनाने की बात थी, जो आज भी कई जगहों पर फाइलों में दबा है। जब तक ‘पांडुम’ केवल उत्सव बनकर रहेगा और इसे ‘आजीविका मिशन’ से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक स्थानीय युवाओं का पलायन नहीं रुकेगा।
विजेता सूची: बस्तर के गौरव
इस बार 12 श्रेणियों में विजेताओं को सम्मानित किया गया, जिनमें मुख्य हैं:
- जनजातीय नृत्य: बुधराम सोढ़ी एवं टीम (दंतेवाड़ा – गौर माड़िया नृत्य)
- जनजातीय नाट्य: लेखम लखा (सुकमा)
- शिल्प कला: ओमप्रकाश गावड़े (कांकेर)
- वनौषधि: राजदेव बघेल (बस्तर)
आपके लिए अगला कदम (Action Points)
यदि आप बस्तर के एक कलाकार या ग्रामीण हैं, तो अपनी कला के पंजीकरण और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए निम्नलिखित कदम उठाएं:
- कलाकार कार्ड: जिला जनसंपर्क कार्यालय या संस्कृति विभाग में आवेदन देकर ‘कलाकार पहचान पत्र’ बनवाएं ताकि सरकारी मेलों में आपको स्टॉल मिल सके।
- हाट बाजार योजना: अपने ग्राम पंचायत के माध्यम से ‘ट्राइफेड’ (TRIFED) के साथ जुड़ने का प्रयास करें ताकि आपके उत्पादों को उचित मूल्य मिले।
- संपर्क: किसी भी समस्या या सुझाव के लिए बस्तर संभाग के सांस्कृतिक नोडल अधिकारी से संपर्क करें।











