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Cg HighCourt Bilaspur
Cg HighCourt Bilaspur

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Bilaspur High Court) ने पैतृक संपत्ति में बेटियों की हिस्सेदारी को लेकर एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 20 दिसंबर 2004 से पहले का कोई भी ऐसा मौखिक बंटवारा, जिसका कोई ठोस प्रमाण न हो, बेटी के सहदायिक (Coparcenary) अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता।

न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालतों के उन आदेशों को निरस्त कर दिया है, जिनमें बेटी की हिस्सेदारी की मांग को खारिज कर दिया गया था।

कानूनी प्रमाण के बिना मौखिक बंटवारा अमान्य हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि कानून द्वारा मान्य बंटवारे का कोई दस्तावेजी प्रमाण मौजूद नहीं है, तो वादी (बेटी) संपत्ति में सहदायिक बनी रहती है। अदालत ने जोर देकर कहा कि:

  • केवल मौखिक दावों के आधार पर बेटी के संपत्ति अधिकार को नकारा नहीं जा सकता।
  • धारा 6(1) का संरक्षण केवल उन्हीं बंटवारों को मिलता है जो पंजीकृत हों या न्यायालय की डिक्री द्वारा किए गए हों।
  • पिता के जीवनकाल में दी गई छोटी-मोटी भूमि या मकान को ‘अंतिम बंटवारा’ नहीं माना जा सकता।
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विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामले का संदर्भ सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के सुप्रसिद्ध ‘विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020)’ मामले का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संशोधित कानून का मूल उद्देश्य लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना है। कानूनन, बेटियों को भी बेटों के समान ही जन्मजात अधिकार प्राप्त हैं और इसे किसी भी अप्रमाणित प्रथा या मौखिक दावे से खत्म नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला? यह पूरा विवाद एक पैतृक कृषि भूमि में हिस्सेदारी की मांग को लेकर शुरू हुआ था। प्रतिवादी पक्ष (भाई/परिवार) का तर्क था कि 20 दिसंबर 2004 से पहले ही मौखिक बंटवारा हो चुका था और वादी को उसका हिस्सा दिया जा चुका था। हालांकि, कोर्ट में कोई पंजीकृत दस्तावेज या न्यायिक आदेश पेश नहीं किया जा सका। साथ ही, माता-पिता के बीच ‘प्रथागत तलाक’ के दावे को भी अदालत ने ठोस सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया।

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निष्कर्ष इस फैसले ने छत्तीसगढ़ में महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को और अधिक मजबूती प्रदान की है। अब यह स्पष्ट है कि पैतृक संपत्ति के मामलों में केवल ‘कागजी और पंजीकृत’ बंटवारा ही कानूनी रूप से मान्य होगा, जिससे बेटियों को उनके वाजिब हक से वंचित करना मुश्किल होगा।

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