छत्तीसगढ़ शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) 2026: क्या सरकार देगी राहत?
रायपुर। छत्तीसगढ़ में सहायक शिक्षक समग्र शिक्षक फेडरेशन ने राज्य के मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को एक कड़ा पत्र लिखकर शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) 2026 की विसंगतियों पर सवाल उठाए हैं। फेडरेशन के अध्यक्ष रविंद्र राठौर ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार ने कट-ऑफ अंकों और पुराने शिक्षकों की नियुक्ति शर्तों में बदलाव नहीं किया, तो हजारों अनुभवी शिक्षकों का भविष्य अधर में लटक जाएगा। यह मामला केवल एक परीक्षा का नहीं, बल्कि राज्य के 33 जिलों में कार्यरत उन गुरुजियों के सम्मान और सेवा सुरक्षा का है जो दशकों से बस्तर के अंदरूनी इलाकों से लेकर सरगुजा की पहाड़ियों तक शिक्षा की लौ जला रहे हैं।

जमीनी हकीकत: परीक्षा का स्तर और शिक्षकों का संघर्ष
शासन का दावा है कि TET परीक्षा मानक प्रक्रिया के तहत ली गई है, लेकिन ग्राउंड जीरो पर कहानी कुछ और है। बिलासपुर और दुर्ग के परीक्षा केंद्रों से निकले परीक्षार्थियों का कहना है कि 2026 का प्रश्नपत्र “लेंदी” (Lenthgy) होने के साथ-साथ आउट ऑफ सिलेबस जैसा महसूस हो रहा था।
ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर ग़रियाबंद और महासमुंद के स्कूलों में पदस्थ शिक्षक जो 15-20 वर्षों से पढ़ा रहे हैं, उनके लिए अचानक से आधुनिक शैक्षणिक मनोविज्ञान के जटिल प्रश्नों को हल करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। “खम्मनपारा (रायपुर जिला) के प्राथमिक शाला में कार्यरत एक शिक्षक” का कहना है, “हम बच्चों को ककहरा सिखाने में माहिर हैं, लेकिन 50 वर्ष की उम्र में हमें उन युवाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करने को कहा जा रहा है जो कोचिंग संस्थानों से रटकर आ रहे हैं। क्या हमारे 20 साल के अनुभव की कोई कीमत नहीं है?
जिला-वार प्रभाव और आदिवासी अंचलों की चुनौती
फेडरेशन की मांग का सबसे बड़ा असर बस्तर, सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों पर पड़ेगा।
- आदिवासी बेल्ट: इन क्षेत्रों में कार्यरत स्थानीय शिक्षकों के लिए 50% का कट-ऑफ पार करना एक कठिन बाधा साबित हो रहा है। यदि इसे घटाकर 33% नहीं किया गया, तो अंदरूनी इलाकों के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी हो जाएगी क्योंकि नए अभ्यर्थी वहां जाने से कतराते हैं।
- अनुभवी शिक्षक: 1998 और 2005 के शिक्षाकर्मी भर्ती वाले शिक्षक, जो अब ‘शिक्षक एलबी’ संवर्ग में हैं, वे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। अकेले जांजगीर-चांपा और रायगढ़ जैसे जिलों में ऐसे शिक्षकों की संख्या हजारों में है जिन्हें अब विभागीय पदोन्नति के लिए TET की तलवार लटकती दिख रही है।
ऐतिहासिक संदर्भ: 23 अगस्त 2010 की लक्ष्मण रेखा
यह विवाद नया नहीं है। RTE एक्ट 2009 के लागू होने के बाद 23 अगस्त 2010 को एक कट-ऑफ डेट माना गया था। छत्तीसगढ़ में इससे पहले नियुक्त शिक्षकों को हमेशा से छूट की उम्मीद रही है।
फेडरेशन का तर्क: “जब भारत सरकार के राजपत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि पुराने शिक्षकों को इस पात्रता से मुक्त रखा जा सकता है, तो छत्तीसगढ़ शासन इसे अनिवार्य बनाकर पेच क्यों फंसा रहा है?”
पूर्व में भी 2012 और 2016 की TET परीक्षाओं के समय कट-ऑफ को लेकर आंदोलन हुए थे, लेकिन 2026 की परीक्षा के “जटिल स्तर” ने इस आग में घी डालने का काम किया है। तेलंगाना और बिहार जैसे राज्यों ने स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए अंकों में जो रियायत दी है, वही मॉडल अब छत्तीसगढ़ के शिक्षक भी मांग रहे हैं।
क्या हैं फेडरेशन की मुख्य मांगें?
- कट-ऑफ में भारी कटौती: आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) के लिए 50% से घटाकर 33% और सामान्य वर्ग के लिए 60% से घटाकर 40% अंक किए जाएं।
- अनुभव का सम्मान: 15 वर्ष से अधिक सेवा वाले शिक्षकों को कम से कम 15 बोनस अंक दिए जाएं।
- विभागीय परीक्षा: सीधी भर्ती के अभ्यर्थियों और कार्यरत शिक्षकों के लिए एक ही पेपर न होकर, कार्यरत शिक्षकों हेतु अलग से ‘विभागीय TET’ आयोजित हो।
- पुरानी नियुक्ति पर छूट: 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को स्थायी रूप से TET से मुक्त रखा जाए।
आगे क्या करें? (Action Plan for Teachers)
प्रभावित शिक्षक साथी और अभ्यर्थी वर्तमान में फेडरेशन द्वारा चलाए जा रहे हस्ताक्षर अभियान से जुड़ सकते हैं।
- अपने ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपें।
- 2010 से पूर्व नियुक्ति के अपने दस्तावेज़ तैयार रखें ताकि कानूनी स्थिति स्पष्ट रहे।
- आगामी कैबिनेट बैठक के निर्णयों पर नज़र रखें, जहाँ इस प्रस्ताव पर चर्चा होने की संभावना है।
हेल्पलाइन: शिक्षा विभाग संबंधित जानकारी के लिए 1800-233-1152 पर संपर्क करें (कार्यकाल समय में)।











