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Sonam Wangchuk
Sonam Wangchuk

सोनम वांगचुक की रिहाई और छत्तीसगढ़ के आंदोलनों की गूंज

लद्दाख की छठी अनुसूची और पर्यावरण संरक्षण की मांग को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लिए गए प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को शनिवार दोपहर करीब 1:30 बजे जोधपुर सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया। केंद्र सरकार द्वारा उनकी हिरासत तत्काल प्रभाव से रद्द करने के फैसले के बाद यह कदम उठाया गया है। वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को लेह जिला मजिस्ट्रेट के आदेश पर हिरासत में लिया गया था, जिसके बाद उन्हें जोधपुर स्थानांतरित कर दिया गया था।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह खबर केवल एक राष्ट्रीय समाचार नहीं है, बल्कि राज्य के उन हिस्सों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो वर्तमान में जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं।

जमीनी हकीकत: बस्तर और हसदेव के आंदोलनों से जुड़ाव

छत्तीसगढ़ के बस्तर (दंतेवाड़ा, सुकमा) और सरगुजा (हसदेव अरण्य) क्षेत्रों में ग्रामीण लंबे समय से संवैधानिक अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। वांगचुक की रिहाई का सीधा संदेश उन आदिवासियों तक पहुंच रहा है जो ‘हसदेव बचाओ’ आंदोलन के तहत पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे हैं।

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ग्राम खम्मनपारा के ग्रामीण रामलाल साहू कहते हैं, “जब बड़े कार्यकर्ता जेल जाते हैं और लड़कर बाहर आते हैं, तो हमें भी भरोसा मिलता है कि शांतिपूर्ण विरोध बेकार नहीं जाएगा। लद्दाख की तरह हमारी मांग भी सिर्फ अपनी जमीन बचाने की है।” राज्य में पिछले दो वर्षों में पर्यावरण संबंधी विरोध प्रदर्शनों में 15% की वृद्धि देखी गई है, जो यह दर्शाता है कि स्थानीय लोग अब नीतिगत फैसलों में अपनी भागीदारी चाहते हैं।

हाइपरलोकल प्रभाव विश्लेषण: बस्तर बनाम सरगुजा

वांगचुक की रिहाई और उनके द्वारा उठाए गए ‘छठी अनुसूची’ के मुद्दे का छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्रों (PESA कानून प्रभावित) पर गहरा प्रभाव पड़ता है:

  • हसदेव अरण्य (कोरबा, सूरजपुर): यहाँ के ग्रामीण कोल माइनिंग के खिलाफ लामबंद हैं। वांगचुक की रिहाई से यहाँ के सक्रिय समूहों को कानूनी लड़ाई और अहिंसक प्रदर्शनों के लिए नई ऊर्जा मिलने की संभावना है।
  • बस्तर संभाग (दंतेवाड़ा, बीजापुर): यहाँ ‘नक्सल प्रभावित’ टैग के कारण अक्सर लोकतांत्रिक विरोध को दबा दिया जाता है। वांगचुक पर लगा NSA और फिर उनकी रिहाई यह रेखांकित करती है कि लोकतांत्रिक आवाज को लंबे समय तक बंद नहीं रखा जा सकता।

विशेष नोट: छत्तीसगढ़ के लगभग 32% भूभाग पर आदिवासी समुदाय निवास करते हैं, जिनके लिए अनुच्छेद 244 के तहत विशेष प्रावधान हैं। वांगचुक की जीत इन संवैधानिक प्रावधानों के प्रति जागरूकता बढ़ाएगी।

ऐतिहासिक संदर्भ और पैटर्न की पहचान

यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े पर्यावरण कार्यकर्ता की गिरफ्तारी ने छत्तीसगढ़ में हलचल पैदा की हो। साल 2022 में जब हसदेव के ग्रामीणों ने पदयात्रा की थी, तब भी उन्हें राज्य सीमा पर रोकने की कोशिश हुई थी। 2020 के बाद से छत्तीसगढ़ में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (सड़क और खनन) के खिलाफ कम से कम 12 बड़े जन-आंदोलन हुए हैं। लद्दाख की तरह, छत्तीसगढ़ में भी यह पैटर्न दिख रहा है कि विकास के नाम पर स्थानीय निवासियों की सहमति (ग्राम सभा) को नजरअंदाज किया जा रहा है।

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निष्कर्ष और अगला कदम: सोनम वांगचुक की रिहाई संवैधानिक अधिकारों की जीत है। छत्तीसगढ़ के जो ग्रामीण या कार्यकर्ता अपनी जमीन और पर्यावरण के अधिकारों के लिए कानूनी सलाह चाहते हैं, वे राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (State Legal Services Authority) से संपर्क कर सकते हैं।

  • हेल्पलाइन: 07752-241023 (रायपुर कार्यालय)
  • कार्रवाई: अपनी ग्राम सभा के प्रस्तावों की प्रति सुरक्षित रखें और किसी भी भूमि अधिग्रहण की स्थिति में ‘पेसा कानून 1996’ के प्रावधानों का अध्ययन करें।

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